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कर्ण पिशाचिनी-एक अनोखी कहानी Part-2

कर्ण पिशाचिनी-एक अनोखी कहानी Part-1 के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे साधक मंत्र सीखने के लिए अगोरी के साथ कामाख्या मंदिर में गया। अब हम इस कहानी में अगला भाग पढ़ेंगे

                               

साधक मान जाते हैंऔर उस बुढे अघोरियो के गुरु के पास रहते हैं और उन गुरुओं से वो बहुत सारे तंत्र मंत्र का ज्ञान सीखते हैं और समय इस तरह से वक्त गुज़रता है और साधक कई तंत्र विद्याओं और कलाओं में माहिर हो जाते हैं फिर भी साधक को वो नहीं मिल पा रहा था जो उन्हें चाहिए था तो साधक फिर भी अपनी विद्या में लगे हुए थे फिर एक दिन वो बुड्ढे अघोरी उन्हें बुलाते हैं और कहते हैं कि मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूं जो मेरे पास है पर साधक समझ नहीं पाता कि वो गुरु अघोरी उन्हें क्या देना चाहता है पर देने से पहले वो साधक को उस लायक बनने को कहते है ताकि उसे संभाल सके.

और इतना कहने के बाद वो गुरु जी उन्हें वापस जाने को कहते है और साधक वहां से चले जाते है कुछ दिन के बाद साधक को रात को ऐसा लगता है कि उनके गुरु अघोरी के कुटिया में कुछ हलचल हो रही है तो साधक को ऐसा लगता है की रात के समय कोई जानवर उनकी कुटिया में घुस गया है और गुरु जी के साथ समान को गिरा दिया गया तो वो उसे देखने के लिए जाते हैं लेकिन देखते हैं कि हलचल बंद हो गई है तो वो कुटिया के छोटे से जगह से अंदर झाकते हैं और वो चौक जाते हैं वो देखते है कि एक स्त्री जोकी गुरु अघोरी के ऊपर बैठी है और गुरु के साथ यौन संबंध कर रही होती है और साधक ये देख बिल्कुल चौक जाते हैं कि इतना वृद्ध व्यक्ति किसी स्त्री के साथ संबंध कैसे बना सकता है और वो वहां से चले जाते हैं.

और सुबह सबको बताते हैं कि कल रात उन्हें गुरु जी को किसी स्त्री के साथ सेक्स करते देखा तो सभी लोग साधक को आश्चर्य से देखने लगे और फिर किसी दूसरे अघोरी ने उन्हें बताया कि वह सब भी साधना का ही दृश्य था जिसमें तुम भी थे एक दिन करना होगा साधक को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था तभी उस बुढे अघोरी ने साधक को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें आज से एक नई विद्या सिखाऊंगा जिसके बारे में मैं तुम्हें किसी को कुछ भी नहीं बता सकते और न ही किसी भी अनुष्ठान को अधूरा छोड़ना है साधक मान जाता है तो साधक को कुछ अनुष्ठान बतायें जाते है कि कुछ देवी मंत्र है जो उन्हें बार-बार किसी एकांत में जाकर उचारण करना है और साथ में ही उन्हें अपने शरीर की अपसिष्ट जैसे मल मूत्र को खाना पीना है और दिन भर उन्हें नंगा रहना है एक जमीन पर गोले के अंदर और अपने मल मूत्र को अपने शरीर पर लगाना है 


ऐसे कुछ उन्हे जोकी वो 5 दिन करते है और पहले तो वो अपने मल मूत्र को खा पी भी नहीं पाते पर धीरे धीरे अपने गुरु के आज्ञा को मानकर खा लेते है और कर्ण पिशाचनी का जाप करते रहते है. साधक का शरीर बहुत गंदा और बदबुदार हो जाता है और साधक को कुछ ऐसा लगता है कि कोई भयावह स्त्री उसके पास आई और कान में बोलती है कि मुझे अपना रक्त दो मुझे तुम्हारा रक्त पीना है और साधक एक चाकु से अपने हथेली को काट देते है और कर्ण पिशाचनी उस खुन को पीने लगती है और साधक को कहती है मै बहुत खुश हुई अब बताओ तुम मुझे किस रूप में प्राप्त करना चाहते हो साधक कहते है मै तुम्हे अपनी स्त्री के रूप मे प्राप्त करना चाहता हुँ तभी कर्ण पिशाचनी अपने गले से एक छोटी छोटी हडियो से बनी हुई माला को निकालती है तथा साधक के गले मे डाल देती है। और फिर गायब हो जाती है। अब साधक अनुष्ठान को पुरा करके वापस वो उस स्थान पर आते है जहां उनके बुद्धे गुरु जी रहते थे. जब वो अपने गुरु के पास वापस आए तो साधक को ये पता चला कि उनके गुरु की मृत्यु हो चुकी है और बाकी के अघोरियों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया है ये सुन कर साधक और ज्यादा परेशान हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि अब वो पूरी तरह से अकेले है तथा उनका जीवन अब एक साधु के रूप में ही गुजरेगा और यहीं उनकी नियति है। यूहि ही दो तीन दिन और गुजर जाते हैं और साधक रात को अपनी तपस्या की अवस्था में बैठे होते हैं और कुछ मंत्रो का उचारण कर रहे होते हैं तभी उनके काम में किसी स्त्री की आवाज सुनाई देती है और उनका ध्यान टूट जाता है. साधक अपने चारो तरफ देखते हैं पर उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं देता और वो फिर से अपने मंत्र उचारन में लग जाते हैं और फिर कुछ देर बाद कुछ भनभनाहत की आवाज उन्हें सुनायी पड़ती है और वो फिर अपने चारो तरफ देखते हैं और इस बार उन्हें ऐसा लगता है कि कोई आत्मा उन्हें छुने की कोसिस कर रही है पर उनकी सिधियो की वजह से उन्हें छू नहीं पा रही है. साधक समझ जाता है कि जो कर्ण पिशाचनी के अनुष्ठान को उनके गुरु जी के द्वारा बताया गया था, वह अनुष्ठान पूरा हो गया था पर वो कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि इसके आगे क्या करना है फिर साधक की रात इसी सोच के साथ गुजरती है और सुबह साधक उसी अघोरी से मिलता है जो उन्हें यहां कामख्या लेकर आया था और उस अघोरी को सारी बात बताता है तो वो अघोरी साधक को बताता है कि वो जो चाहता था वो उससे मिल चूका है अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो कैसे इसका उपयोग करेगा और वो साधक को कहते थे कि उसकी सारी विद्या जो एक साधक के लिए पर्याप्त होती है वो सीख चूका है.और वो अब अपने घर जा सकता है और अब साधक को आभास होता है कि वो लोगो की बातों को सुन पा रहे हैं जो व्यक्ति उनके आस पास होते है  उनके मन की बात वो पढ़ लेते हैं और नहीं तो उन्हें हर प्रकार के भूत प्रेत को वो देख पा रहे हैं वो सब उन्हें चिल्ला चिल्ला कर उन्हें कुछ कह रहे हैं.साधक के लिए ये सब कुछ अंजान नहीं था क्योंकि अपनी विद्या सीखने के दौरान वो इन सब चीजें पर नियन्त्रण करना सीख लिया था.


साधक को लगता है अपने घर वापस जाकर अपनी जिंदगी को फिर से शुरू करना चाहिए और एक अच्छा जीवन व्यतीत करना चाहिए अब साधक के पास इतनी सीधी और शक्ति थी कि वो किसी भी काम को करने के लिए सफल हो रहे थे.साधक जब अपने घर के लिए निकलते हैं तो उन्हें फिर से उस लड़की की याद आती है जो उन्हें ट्रेन में मिली थी और वो उसके बारे में सोचते हुए घर जा रहे होते हैं उनका सफर बहुत लंबा था और वो एक ट्रेन में चढ़ते है जोकी भोपाल कि थी ट्रेन में चढ़ने के बाद वो एक अन्य पुरुष की सीट पर बैठ जाते है जोकी उस वक्त वहा नहीं होता कुछ देर के बाद वो पुरुष वापस आ जाता है तथा उनको वहां से उठने के लिए बोलता है पर साधक का मन वहा से उठने का नहीं होता क्योंकि ट्रेन में भीड बहुत ज्यादा होती है और ट्रेन भी चल पडती है कुछ देर बाद वह व्यक्ति उन्हें मन ही मन उन्हें गली देता है जो वो सुन लेते है तथा वो उन्हें मंत्रो के द्वारा बेहोस कर देते हैं और आराम से बैठे हुए होते है कुछ देर बाद ट्रेन का टिकट चेकर आता है और उनसे टिकट मांगता है पर उनके पास कोई टिकट नहीं होता और वो उन्हें पैसे देने के लिए बोलता है ये सुनकर साधक को बहुत अजीब महसूस होता है कि वो टिकट कहां से लेकर आएंगे और उनके पास देने के लिए पैसे भी नहीं हैं तो वो अपने थैले में हाथ डालते हैं कि कुछ पैसे है उनके पास वो उसे दे देंगे पर जैसे ही वो अपने थैले में हाथ डालते हैं उन्हें कुछ कागज की पर्ची जैसे कुछ महसूस होता है और वो उसे बाहर हैं तो वो और टीटी दोनो चौक जाते हैं कि अभी तो टिकट नहीं था साधक के पास अब अचानक से कैसे आ गया टीटी उसे टिकट लेता है और देखता है कि उनके नाम पर एक सीट भी बुक है और साधक को भी नहीं पता होता टीटी साधक को कहता है कि आपके पास कन्फर्म टिकट है तो आप झूठ क्यों बोल रहे हैं और उनकी सीट बता देता हैं कि वहा जाकर आप बैठ जाएं और साधक अपनी सीट पर बैठ गए और मन ही मन ये समझ जाए कि ये उसी कर्ण पिसाचनी का ही काम हे क्यूकी अन्होने तो टिकट नहीं ली थी और वो अपने थैले में फिर से हाथ डाल कर चेक करते है और क्या क्या है उसमे तो उन्हें एक नोट की गड़ी मिलती है | 


मेरे सभी प्रिय पाठको, इस कहानी में जो आपने पढ़ा, यह सब सच है। लेकिन इस कहानी में बस इतना ही, कृपया कहानियों का अगला भाग पढ़ें!



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1 comment:

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